अद्भुत इतिहास है पांगी के जुकारू उत्सव का, जानें आस्था से जुड़ी कहानी

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पांगी, 4 मार्च। हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के जनजातीय क्षेत्र पांगी में जुकारू उत्सव के समापन अवसर पर चार प्रजामंडलों ने बहरालू मेला मनाया। इसे पंगवाली भाषा में मेई मेले के नाम से भी जाना जाता है। जुकारू के 12 दिनों तक चार प्रजामंडलों के लोग एक-दूसरे की पंचायतो में नहीं जाते थे। 12 दिन के बाद पुर्थी में जब मेला होता है। उसी दौरान चारों पंचायतों के लोग एक-दूसरे के साथ मिलते हैं। इस दौरान रेई और शौर से रथयात्रा निकाली गई। सुबह 6 बजे मलासनी माता मंदिर पुर्थी में थांदल और पुर्थी की प्रजा लकड़ी से बनी कुकड़ी (माता का खिलौना) की सजावट करते हैं। उसे 9 बजे रथयात्रा के लिए तैयार किया जाता है। जिस घर की छत के ऊपर यह मेला मनाया जाता है। वहां 24 घंटे दीया जलाकर बलिदानों राजा की पूजा की जाती है।


मलासनी माता मंदिर के पुजारी भूरी सिंह, पूर्ण चंद और श्रीकंठ ने बताया कि मेले के खत्म होने के बाद माता के खिलौने कुकड़ी को मेले स्थल से वापस लाया जाता है। और अगले दिन कुकड़ी के गहने उतारने से पहले बलि दी जाती थी। लेकिन बलि प्रथा बंद होने के बाद अब नारियल चढ़ाया जाता है।
क्या है मेले का इतिहास
इस मेले का इतिहास काफी रोचक हुआ दिव्य आस्थाओं के साथ जुड़ा हुआ है। स्थानीय बुजुर्गों के मुताबिक किसी जमाने में मलासनी माता मंदिर में माता का खिलौना‘ यानी कुकड़ी सोने की बनी हुई थी। फिर जब इस सोने की कुकड़ी के बारे में एक घमंडी साधु को जानकारी मिली तो उसने उसे वहां से चोरी करने की साजिश रची। साधु अपनी इस साजिश में कामयाब हो गया और मलासनी माता के मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित चंद्रभागा नदी के तट को पार कर रहा था तो अचानक उसकी आंखों की रोशनी चली गई। उसे ऐसा आभास हुआ कि कोई देवी शक्ति उसका मार्ग रोक रही है, साधु ने तुरंत अपनी जान को बचाते हुए माता के उस खिलौने को चंद्रभागा नदी में फेंक दिया।


इतिहासकारों के मुताबिक जैसे ही खिलौना चंद्रभागा नदी में फेंका तो चंद्रभागा नदी का बहाव 1 सप्ताह तक रुका रहा। माता के खिलौने के नदी में गिरते ही पूरे गांव में उथल पथल होने लगी। उसी बीच गांव के साथ लगते टड नामक स्थान पर एक व्यक्ति ने अपने बच्चे के लिए लकड़ी का खिलौना बनाया हुआ था, जब उसे पता चला कि माता की कुकड़ी एक घमंडी साधु द्वारा चोरी कर ली गई है तो उसने उस खिलौने को माता की कुकड़ी मानकर उसे मंदिर में चढ़ा दिया उसके बाद यह प्रथा आज दिन तक चलती आ रही है। लोग उस कुकड़ी की सजावट करके उसे सोने व चांदी के गहने पहनाकर इस मेले के लिए तैयार करते है। लोगों कि इस मेले के प्रति काफी आस्था जुड़ी हुई हैं।

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