नई पीढ़ी को पुराने शिल्पियों की रचनाओं से परिचित कराएगी लघुकथा-संग्रह ‘सलाम दिल्ली’

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वरिष्ठ साहित्यकार अशोक लव रचित लघुकथा संग्रह ‘सलाम दिल्ली’ के द्वितीय संस्करण का लोकार्पण ‘लेख्य मंजूषा’ पटना द्वारा आयोजित एक भव्य गोष्ठी में प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के प्रांगण के खुले वातावरण में 12 सितंबर को एक उमस भरी दोपहर में संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम में ‘लेख्य मंजूषा’ के स्थानीय सदस्यों के अलावा पंजाब और राजस्थान से आए सदस्यों ने भी भाग लिया।
‘सलाम दिल्ली’ स्मृतिशेष रवि प्रभाकर की प्रिय लघुकथाओं में से एक थी। वे इस लघुकथा से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने कहा था कि इस रचना पर एक विस्तृत शोधात्मक आलेख लिखेंगे। इसी उद्देश्य से उन्होंने अशोक लव से ‘सलाम दिल्ली’ की प्रति मँगवाई थी। अशोक लव के पास केवल रिकाॅर्ड हेतु रखीं केवल पाँच प्रतियाँ ही शेष थीं जो लगभग तीन दशकों से उन्होंने सँभालकर रखी हुई थी। यह बात रवि भाई ने ही मुझे बताई थी। तब मैंने ही उन्हें सलाह दी थी कि आप धन्यवादस्वरूप इस पुस्तक का दूसरा संस्करण अपने ‘देवशीला पब्लिकेशन’ से प्रकाशित करें। इससे आज की पीढ़ी को भी पुराने शिल्पियों की रचनाएँ पढ़ने का अवसर भी प्राप्त होगा। इस संकलन की, ‘सलाम दिल्ली’, ‘रामौतार की गाय’, ‘चमेली चाय’, ‘घंटियाँ’, ‘मृत्यु की आहट’, ‘गालियों की सार्थकता’ आदि लघुकथाएँ शिल्प और शैली की दृष्टि से कालजयी बन पड़ी है। किंतु ‘राजा साहब की बख़्शीश’ और ‘बाप’, विषय के दृष्टिकोण से एक अति-विशिष्ट कृतियाँ हैं, जिनमें कथानक की ‘आउट ऑफ़ दि बाॅक्स’ ट्रीटमेंट देखते ही बनती है।
वरिष्ठ साहित्यकार अशोक लव की साहित्यिक-शैक्षिक लगभग 150 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और सौ से अधिक पुस्तकों में उनकी रचनाएँ संकलित हैं। ‘शिखरों से आगे’ उपन्यास और उनके साहित्य पर पीएच.डी. और एम.फ़िल. हुई हैं। उनकी चर्चित पुस्तकें हैं- ‘लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान’, ‘सलाम दिल्ली’, ‘पत्थरों से बँधे पंख’, ‘हिंदी के प्रतिनिधि साहित्यकारों से साक्षात्कार’, ‘सर्वजन हिताय श्रीमद्भागवदगीता’, ‘खिड़कियों से झाँकते लोग’ आदि। उन्हें ‘विद्यासागर’, ‘विद्यावाचस्पति’, ‘साहित्यलंकार’ उपाधियों से अलंकृत किया गया है। उन्हें 70 से अधिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है। प्रमुख सम्मान हैं- ‘कबीर सम्मान’, ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र सम्मान’, ‘सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान’, ‘मोहयाल गौरव सम्मान’, ‘याज्ञवल्क्य पत्रकारिता सम्मान’,’ डॉ. विजयेंद्र स्मृति सम्मान’ आदि। वे सर्व भाषा ट्रस्ट और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति अमेरिका (दिल्ली-एन.सी.आर) के अध्यक्ष हैं।
अशोक लव के शब्दों में- ‘सलाम दिल्ली’ का पुन: प्रकाशन तीस वर्षों के पश्चात हो रहा है। इन वर्षों में सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक परिस्थितियाँ ही परिवर्तित नहीं हुईं हैं अपितु इन्टरनेट-क्रांति ने प्रत्येक व्यक्ति की जीवन-शैली को ही परिवर्तित कर दिया है। फ़ेसबुक, व्हाट्सएप, इंसटाग्राम, ट्विटर, कू, यूट्यूब आदि अभिव्यक्ति के नए माध्यम बन गए हैं। इसका प्रभाव साहित्य पर सीधा पड़ा है। ‘सलाम दिल्ली’ में मेरी वर्ष 1975 से 1990 तक की लघुकथाएँ संकलित हैं। उस समय लघुकथा अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्षरत थी। मैंने और अन्य कई लघुकथाकारों ने अनेक लघुकथा-गोष्ठियों का आयोजन किया था। आज सैकड़ों संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, विश्विद्यालयों से शोधकार्य हो चुके हैं, नए-नए लेखक लघुकथाएँ लिख रहे हैं। यह सुखद स्थिति है। ‘सलाम दिल्ली’ के पुन: प्रकाशन की योजना योगराज प्रभाकर और रवि प्रभाकर ने बनाई थी। सितंबर 2020 में रवि प्रभाकर ने ‘सलाम दिल्ली’ की प्रति पढ़ने के लिए मंगाई थी। उनके मन में क्या था, उन्होंने बताया नहीं था। मई 2021 में कोरोना ने उन्हें हमसे छीन लिया। निधन के कुछ दिन पूर्व उनका फ़ोन आया था कि मैं कोरोना संक्रमण से सतर्क रहूँ, और वे स्वयं हमें छोड़ गए। उनके शब्द आजीवन मेरे कानों में गूँजते रहेंगे। उनका निधन स्तब्ध कर गया। योगराज प्रभाकर से अब पता चला है कि दोनों भाइयों में ‘सलाम दिल्ली’ को लेकर चर्चा हुई थी। उन्होंने रवि प्रभाकर को कहा था- “आज की पीढ़ी को ‘सलाम दिल्ली’ लघुकथा-संग्रह अवश्य उपलब्ध कराया जाना चाहिए ताकि वे पुराने शिल्पियों की रचनाओं से परिचित हो सकें।” मैं योगराज प्रभाकर की भावनाओं का सम्मान करता हूँ। उनका आभारी हूँ। मुझे प्रसन्नता हो रही है कि इसका प्रकाशन स्वर्गीय रवि प्रभाकर ‘देवशीला पब्लिकेशन’ से हो रहा है। नई पीढ़ी को ‘सलाम दिल्ली’ की लघुकथाएँ पसंद आएँगी। ‘सलाम दिल्ली’ का यह संस्करण स्वर्गीय रवि प्रभाकर को समर्पित है।
लोकार्पण के शुभ अवसर पर शामिल थे मधुरेश, रवि, सुप्रसिद्ध साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी, डॉ ध्रुव कुमार, योगराज प्रभाकर, डॉ० अनिता राकेश, लेख्य मंजूषा की अध्यक्ष विभा श्रीवास्तव, चन्द्रबिन्दु व सीमा कुमारी।

मानव जीवन में विशेष स्थान रखती है शिक्षक और साहित्य की भूमिका

 

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