कभी तो वो सुबह आएगी, जब हंसुली-दाथियों की बात सुनी जाएगी!

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  • आंसुओं की अलकनंदा देखी तो पिघल गया सचिन
  • जोशीमठ के दर्द को देखा तो दवा लेने तय की 300 किमी पैदल दूरी

देहरादून के कचहरी परिसर स्थित शहीद स्मारक के पास बैठ कर एक दोने में दाल-चावल खा रहे सचिन के पास गया। पतली-छछहरी काया। बाल बिखरे से और दाढ़ी बढ़ी हुई। यह दाढ़ी फैशन की नहीं है, पिछले 15 दिनों में बढ़ी। सचिन रावत गोचर पालीटेक्निक में सिविल ट्रेड पढ़ रहा है। जब जोशीमठ दरकने लगा तो वह भी गोचर से वापस जोशीमठ लौटा।
सचिन को वहां एक और ही अलकनंदा दिखाई दी। आंसुओं की अलकनंदा। रविग्राम की जिन गलियों में उसने चलना-फिरना सीखा। खेला-कूदा। उन गलियों में दरारें थी। जिन दोस्तों के घरों में खेला तो वहां के अधिकांश घरों में दरारें आ गयी थी। यह देख वह विचलित हो गया। मैंने हौले से पूछा, और तुम्हारा घर। उसने धीरे से अपना सिर उठाया और बोला, हल्की दरारें हैं, रेडक्रास नहीं लगा। रेडक्रास का अर्थ है कि ऐसे निशान लगे घरों में कोई नहीं रह सकता।
सचिन के पिता नहीं हैं। उनका निधन हो चुका है और मां उनकी जगह बैंक में नौकरी करती है। सचिन जानता है कि उसकी मां ने किन कठिन परिस्थितियों में उनको पाला-पोसा है। यही हाल वहां के आसपास के लोगों का है। मेहनत-मशक्कत कर वहां लोग जीवन यापन कर रहे हैं। सचिन के अनुसार जब उसने वहां का हाल देखा तो उसकी आंखें नम हो गयी। शासन-प्रशासन का रवैया अखरने लगा। विस्थापन और मुआवजा आज भी दूर की कौड़ी हैं। सचिन कहता है कि सवाल केवल जोशीमठ का नहीं बल्कि पूरे पहाड़ का है। बस, यही लगा कि कुछ करना चाहिए।
सचिन के अनुसार सूझ नहीं रहा था लेकिन तय कर लिया था कि जोशीमठ और हिमालय बचाने का संदेश लेकर देहरादून जाएंगे। वहां सत्ता के गलियारे में तो जोशीमठ प्रभावितों की आवाज पहुंचाएंगे कि जोशीमठ और हिमालय को बचा लो। सचिन और आयुष डिमरी ने सोशल मीडिया पर पैदल मार्च की बात शेयर की। इसके बाद उनके साथ इस दल में मयंक भुंजवान, ऋतिक राणा, ऋतिक हिंदवाल, अभय राणा, कुणाल सिंह, तुषार धीमान, अमन भौटीयाल जुड़ गये। 1 मार्च से जोशीमठ से चले और आज सुबह देहरादून पहुंचे। पूरे 300 किलोमीटर पैदल चले। सभी युवा हैं और पहाड़ को लेकर संवेदनशील हैं। इनकी बातें सुनी जानी चाहिए। सचिन, आयुष और इनकी पूरी टीम के जज्बे और हिमालय को लेकर संवदेनशीलता को सैल्यूट। देखना, एक दिन कभी तो वह सुबह आएगी, जब हंसुली और दाथियों की बात सुनी जाएगी।
[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से साभार]

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