क्या विधायक मुन्ना ने लोहारी के ग्रामीणों से किया ‘खेल‘?

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  • लोहारी गांव पर प्रशासन की सर्जिकल स्ट्राइक, सरासर झूठ, मुआवजा बांट दिया
  • भूमि अधिग्रहण के यह कैसे मानक, अधिग्रहण पुरानी दर पर बांध निर्माण नई दर पर!

5 अप्रैल की शाम को उत्तराखंड के लोहारी गांव में जिला प्रशासन की टीम ने ग्रामीणों को धारा 40 (2) नोटिस दिया कि अगले 48 घंटे में गांव खाली कर दो। नहीं तो बुल्डोजर चला दिया जाएगा। ग्रामीण डर गये और अपने पुरखों का आशियाना खुद तो तोड़ने लगे। पुरखों ने जिन घरों को तिनका-तिनका जोड़कर बनाया था, उस घर पर जब ग्रामीण हथौड़ा या कुदाल चला रहे थे तो उनके दर्द को महसूस किया जा सकता है। जौनसार के घर शाल और देवदार की कीमती लकड़ी से बने होते हैं। लाखों की कीमती लकड़ी यूं ही यमुना में जल समाधि ले रही है और साथ में इस गांव की सभ्यता और संस्कृति दोनों ही डूब गये। क्या लोहारी के ग्रामीण पाकिस्तानी थे जो प्रशासन ने उन पर इस तरह से सर्जिकल स्ट्राइक कर दी? ग्रामीणों को एक सप्ताह का समय तो दिया सकता था? अब कई परिवार सरकारी स्कूल में शरणार्थियों की तरह रह रहे हैं। उनकी इस हालात का जिम्मेदार कौन है?
यमुना पर बन रहे व्यासी बांध की झील का जलस्तर में लोहारी के ग्रामीणों की आंसुओं की बाढ़ भी है। सत्ता ने विकास के लिए इस गांव की बलि ली लेकिन ग्रामीणों को इंसाफ नहीं दिया। इस गांव के लोग पिछले दो साल से न रातों को ढंग से सो पाए और न ही चैन की रोटी खा सके। कारण, सरकार की नीतियां और मुआवजा हड़पने और कमीशन खाने की बंदरबांट। 1777.30 करोड़ रुपये की इस परियोजना में महज 72 करोड़ रुपये लोहारी के ग्रामीणों के लिए नहीं निकले।
सरकार ने बांध के लिए लोहारी गांव की 17 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया। यह योजना लगभग 50 साल पुरानी है। उस दौरान मौजूदा ग्रामीणों के पुरखों को कुछ मुआवजा मिला। तब बांध की लागत भी महज 100 करोड़ के आसपास थी। इस बांध के निर्माण में अनेक बाधाएं आईं। और 2014 के बाद इस पर काम दोबारा शुरू हुआ। ग्रामीणों के अनुसार गैमन इंडिया ने कुछ ग्रामीणों को रोजगार दिया। कुछ को सरकार ने दिया।
अब बात मुआवजे की। ग्रामीणों के अनुसार सरकार ने उनकी भूमि हिस्सों में अधिग्रहित की। इसका मुआवजा सर्किल रेट पर दिया जा रहा है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण के लिए बाजार दर निर्धारित की है। परिवारों की गितनी में भी झोल है। अभी ग्रामीणों की आठ हेक्टेयर भूमि लखवाड़ के लिए अधिग्रहित की जाएगी। उसका मुआवजा तब मिलेगा। ग्रामीणों की गेहूं, प्याज और अन्य खड़ी फसल झील के पानी में डूब गयी।
प्रशासन झूठ बोल रहा है कि ग्रामीणों को मुआवजा दे दिया। नहीं दिया। कुछ ग्रामीणों को ही मुआवजा मिला है और वह भी सर्किल रेट से यानी पांच लाख रुपये बीघा की दर। सरकार को विस्थापितों को जमीन के बदले जमीन देनी थी। नहीं दी। उन्हें गांव से 40 किलोमीटर दूर धराई खादर में 25 वर्गमीटर की जगह देने की बात हुई है। क्या इतनी कम भूमि पर ग्रामीणों की गुजर-बसर हो सकती है? उनके पशु कहां जाएंगे। चारा-पत्ती कहां से आएगी? ग्रामीण खेती कर गुजारा करते थे, कहां करेंगे।
ग्रामीणों का आरोप है कि गैमन इंडिया में ठेकेदारी या नौकरी करने वाले ग्रामीणों या यूजेवीएनएल में नौकरी पाने वाले ग्रामीणों के मुआवजे में से पांच-पांच लाख रुपये काट दिये गये कि हमने आपको रोजगार दिया। यानी सरकार न हुई, नौकरी दिलाने वाले बिचौलिया कंपनी हो गयी। दरअसल, अब सरकार के पास किसी के भी बैंक खातों की डिटेल है। सरकार किसी के खाते में दस रुपये डाल कर कह सकती है हमने तो मुआवजा दे दिया। यानी कोर्ट में कहने के लिए मुआवजा रकम डाल दी गयी। ऐसे में कई ग्रामीणों ने पहले ही अपने बैंक खाते बंद कर दिये थे।
पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत ने विधानसभा चुनाव से पहले आयोजित सत्र में कहा था कि लोहारी के ग्रामीणों को एक-एक करोड़ दिया जाएगा। कहां गया वह वादा? ग्रामीणों के अनुसार विधायक मुन्ना सिंह की इस पूरे मामले में भूमिका संदिग्ध है। जब-जब आंदोलन हुआ तो मुन्ना ने ग्रामीणों के साथ मौखिक और लिखित वादा किया कि वह उनके साथ नाइंसाफी नहीं होने देंगे। लेकिन बाद में मुन्ना ने धोखा दे दिया। मुन्ना की इस प्रकरण में भूमिका पर सवालिया निशान हैं। उन पर गैमन इंडिया कंपनी के साथ मिलीभगत के आरोप हैं। ग्रामीणों का कहना है कि विधायक मुन्ना ही लोहारी के लिए मुसीबत बन गये।
मेरा तर्क है कि ग्रामीणों को जमीन के बदले जमीन दो। या बाजार भाव पर मुआवजा। उनका पुनर्वास सही और न्यायपूर्ण हो। भूमि अधिग्रहण के लिए दोहरा मापदंड नहीं होने चाहिए। टिहरी बांध विस्थापितों को भी पूरी तरह से न्याय नहीं मिला। अब पंचेश्वर बांध की बारी है। ऐसे में सरकार को भूमि अधिग्रहण की नई नीति बनानी चाहिए। साथ ही साथ लोहारी प्रकरण में विधायक मुन्ना सिंह चौहान की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए।
[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से साभार]

 

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