‘ज़िन्दगी की यही रीत है हार के बाद ही जीत है’

1888
file photo source: social media

दिल्ली शहर में लगभग पूरा जीवन बिताने के पश्चात, पिताजी वर्ष 1986 में अपनी जन्मभूमि गाँव परोल (हिमाचल प्रदेश) में नया मकान बना रहे थे, मैं भी उनका हाथ बंटाने के लिए कुछ दिनों के लिए वहां गया हुआ था। अचानक एक दिन, मेरे चचेरे भाई उदय सिंह ने मुझे सुबह-सुबह नाश्ता करते हुए बताया बिट्टू पाहू (भाई) अज अहाँरे ग्रां चे छिंज (दंगल) है तुहाँ भी चलना ? मैंने मुस्कुराते हुए हामी भर दी। क्रिकेट तो हम रोजाना गाँव में पहाड़ी देवता (पीपल) के सामने वाले ग्राउंड में खेला करते थे। परन्तु कुश्ती से अनभिज्ञ था, सोचा गाँव के पहलवानों को कुश्ती करते देखेंगे। दंगल स्थल पर रवानगी के समय रास्ते में मेरे सारे भाई बिल्लू, सुनीत, डब्बू डोगरा कुश्ती में हाथ आजमाने के लिए मुझे उकसा रहे थे, खैर गपशप मारते-मारते हम पहुँच गए खेत में। जहाँ पहले से ही आसपास गाँव के भी कुछ बच्चे-बूढ़े गोलाकार-दर्शक दीर्घा बनाए बैठे हुए थे। और वहां नगाड़ा एवं बीन (लोक वाद्य यंत्र) की मधुर गूंज से उत्सव का माहौल सा प्रतीत हो रहा था। पिताजी भी वहाँ पहले से उपस्थित थे, मुझे देखते ही बोले बेटा ये गाँव बीन-बाजा कैसा लग रहा है। मैंने कुछ क्षण वाद्य कलाकारों को ध्यान से देखा और तुरंत पिताजी से नगाड़ा बजाने की इच्छा जाहिर की। बस फिर क्या था मैंने अपनी जिन्दगी में पहली बार नगाड़ा बजाया, लेकिन लयबद्ध बजाने पर कलाकारों के साथ-साथ पिताजी ने भी पीठ थपथपाई।

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थोड़ी ही देर में, हमारे गाँव के वृद्ध मान सिंह जी ने दो पहलवानों के नाम पुकारे और कुश्ती प्रतियोगिता का आगाज हो गया। चार-पांच कुश्ती मैच होने के बाद दो पहलवानों के नाम फिर पुकारे गए उनमें से एक अनुपस्थित था। मेरे भाईयों ने मुझसे पुन: कुश्ती लड़ने के लिए आग्रह किया, चूँकि वे सारे भाई मुझसे उम्र में छोटे थे मैंने उनका मन रखने के लिए बिना तैयारी कुश्ती के लिए मैदान में उतर गया। अपने सामने प्रतिद्वंदी पहलवान से हाथ मिलाते जोर दिखाते हुए, उसने, मुझे, चुटकी में बड़ी फुर्ती से चित कर दिया और मैं अपने जीवन की पहली ही कुश्ती हार गया। लेकिन अब मुझे अपने से अधिक वहां उपस्थित पिताजी एवं भाईयों की प्रतिष्ठा की चिंता सताने लगी, क्योंकि वे मेरे ताकतवर खिलाडी शरीर पर गर्व करते थे। इस बीच मैंने संयम से दो-तीन कुश्तियां को बड़े ध्यानपूर्वक देखा और मन ही मन पुन: कुश्ती लड़ने का विचार बना लिया। और मैंने चुपके से कुश्ती प्रतियोगिता आयोजक मान सिंह जी के कान में अपनी इच्छा व्यक्त की, लेकिन शर्त ये भी रखी कि जिससे मैं कुश्ती हारा उसी से दुबारा लड़ना चाहता हूँ। थोड़ी ही देर में हम-दोनों जवान गबरू फिर से मैदान में उतर गए। इस बार मैंने इस कुश्ती को जीतने के लिए अपने कबड्डी खेले अनुभवों का उपयोग करते हुए उसके पैरों पर आक्रमण किया। उसके लड़खड़ाते ही मैंने फुर्ती दिखाते हुए उसके पीठ पर ग्रिप बनाते हुए सीधा जमीन पर जोर से पटकी देते हुए मैंने आख़िरकार कुश्ती जीती ही ली। मेरे भाईयों ने मुझे बड़े गर्व से बीच मैदान में ही कंधे पर उठा लिया। आज जब उस यादगार लम्हे को याद करता हूँ तो मुझे, मिस्टर इंडिया फिल्म के लिए लिखे जावेद अख्तर साहब के गीत पर मशहूर गायक किशोर जी द्वारा गाया सदाबहार नगमा जुबां पर अनायास ही आ जाता है गौर फरमाएँ।
‘ज़िन्दगी की यही रीत है
हार के बाद ही जीत है’

(एस.एस.डोगरा)

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