विश्वव्यापी है गांधी और गांधीवाद

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नई दिल्ली, 2 अक्टूबर। अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस व गांधी जयंती के उपलक्ष्य में आज उत्थान फ़ाउंडेशन द्वारका की ओर से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार आयोजित किया गया। सह-आयोजक तरूण घवाना ने बताया कि वेबिनार में ‘गांधी- एक साहित्यिक विमर्श’- विषय पर चर्चा एवं काव्य पाठ किया गया। वैश्विक स्तर पर गांधी और गांधीवाद की व्यापकता फ़ीजी से सूरीनाम और चीन से कनाडा तक दिखाई दी।
प्रवासी भारतीयों के अलावा विदेशी मेहमानों ने भी इस वेबिनार में गांधी और गांधीवाद पर अपने वक्तव्य प्रस्तुत किए। हैरानी की बात थी कि विदेशी मेहमान लाल बहादुर शास्त्री को भी याद करना नहीं भूले। भारत से इतर 16 देशों के वक्ताओं ने इस वेबिनार में भाग लिया।
उत्थान फ़ाउंडेशन की संचालिका अरूणा घवाना ने जूम मीट पर आयोजित हुए इस वेबिनार में गांधी के साहित्यकार रूप को प्रस्तुत किया।


वेबिनार के अध्यक्ष प्रसिद्ध भाषाविद डॉ विमलेशकांति वर्मा ने अपना वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि गांधी द्वारा बताए गए पद चिन्हों पर चलना ही विश्व के लिए जरूरी है। साथ ही साहित्यकारों पर उनके व्यक्तित्व और शिक्षाओं के प्रभावों की भी चर्चा की।
वेबिनार के मुख्य अतिथि मॉरीशस से विश्व हिन्दी सचिवालय के उपमहासचिव डॉ शुभंकर मिश्र
ने बताया कि मॉरीशस में गांधीजी के विचारों को लोगों ने आत्मसात किया है। इसी कारण मॉरीशस को सपनों का देश कहा जाता है। साथ ही शैक्षणिक संस्थाओं में गांधीजी को पाठ्यक्रम में पढ़ाने के बारे में भी बताया।
वेबिनार की मुख्य अतिथि श्रीलंका से हिंदी प्रोफ़ेसर डॉ निलंति राजपक्ष ने सिंहली साहित्य में गांधीवाद के प्रभाव के बारे में स्पष्ट किया कि गांधी सिर्फ़ भारत के ही बापू नहीं हैं वरन श्रीलंका में भी उन्हें सम्मान दिया जाता है।
ताशकंद सरकारी प्राच्य विद्या संस्थान की प्रोफेसर (हिन्दी) उल्फत मुखीबोवा ने उज्बेकिस्तान में गांधीजी और लाल बहादुर शास्त्री को याद करते हुए कहा कि उज्बेकिस्तान के लोगों के लिए न तो गांधी और गांधीवाद नया है और न ही लाल बहादुर शास्त्री उनके दिलों से दूर हैं।
नार्वे से कवि गुरू शर्मा ने गांधी जी को याद करते हुए उनके वापस लौट आने की प्रार्थना की।
चीन के क्वान्ग्तोंग विदेशी भाषा विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर (हिंदी) के पद पर कार्यरत डॉ विवेक त्रिपाठी ने चीन में गांधी की मौजूदगी के बारे में बताते हुए कहा कि बेशक गांधी कभी चीन नहीं गए किंतु उनके विचारों से वहां का साहित्य और जनमानस अछूता नहीं है। आज भी उन्हें वहां सम्मानित दृष्टि से देखा जाता है।
यूके से साहित्यकार एवं संपादिका शैल अग्रवाल ने गांधी जी पर अपने व्यक्तिगत विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि गांधी तो सर्वत्र व्याप्त हैं।
कनाडा की “वसुधा” पत्रिका की संपादिका डॉ स्नेह ठाकुर ने गांधी के राम को व्याख्यायित किया। साथ ही कहा कि गांधी जनमानस के मार्गदर्शक हैं|
डेनमार्क से चित्रकार सविता जाखड़ ने बताया कि डेनमार्क में बापू को लोगों ने आत्मसात किया है। उनके आचरण में भी वह व्यक्तित्व है।
सूरीनाम से हिन्दी शिक्षिका लैला लालाराम ने सूरीनाम में गांधीजी के प्रभाव के बारे में बताया।
त्रिनिडाड-टुबैगो से रुकमिणी होल्लास ने काव्यात्मक प्रस्तुति कर समां बांध दिया। और वेबिनार के अंत में गांधीजी का भजन गाकर बापू को श्रध्दांजलि अर्पित की।
इसके अतिरिक्त नीदरलैंड से प्रोफ़ेसर मोहनकांत गौतम, स्वीडन से इंडोस्कैंडिक संस्थान के प्रेज़िडेंट सुरेश पांडे और दक्षिण अफ़्रीका से डॉ रामबिलास ने भी इस अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में भाग लिया।

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