क्या होता है नार्को टेस्ट, क्या है इसका सक्सेस रेट?

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  • अंकिता हत्याकांड में नार्को से अधिक फारेंसिक और बायोलॉजिकल इवीडेंस चाहिए
  • हाईकोर्ट में अंकिता हत्याकांड की जांच सीबीआई को दिये जाने की सुनवाई पूरी, फैसला लंबित

अंकिता भंडारी हत्याकांड में एसआईटी दो महीने के बाद नार्को टेस्ट कराने जा रही है। आरोपियों ने दस दिन का समय मांग लिया है। आखिर एसआईटी को इतनी देर से क्यों लगा कि आरोपियों का नार्को टेस्ट कराना चाहिए? नार्को टेस्ट तो ताजा-ताजा होता है। अवचेतन मन में ताजी घटनाए याद रहती हैं बासी नहीं। वैसे भी कानूनविदों का मानना है कि नार्को टेस्ट की अदालती कार्रवाई में कोई अहमियत नहीं होती है। नार्को टेस्ट के सक्सेस रेट को लेकर भी अलग-अलग राय होती हैं। जबकि स्पष्ट कर दूं कि अंकिता हत्याकांड में आरोपियों को सजा दिलावाएंगे फारेसिंक और बायोलॉजिक इविडेंस। यदि पुलिस के पास ये इविडेंस हैं तो आरोपियों को सजा होगी। नहीं हैं तो छूट जाएंगे। इस मामले में मैंने एसआईटी की हेड डीआईजी पी. रेणुका देवी से बात की तो उन्होंने कहा कि कोर्ट की बात हम बता नहीं सकते।
अब बात नार्को टेस्ट की, क्या होता है नार्को टेस्ट?
नार्को टेस्ट शातिर अपराधियों से जानकारी निकालने के लिए किया जाता है। इस टेस्ट की केटेगरी में पॉलीग्राफ और ब्रेन मैपिंग टेस्ट भी आते हैं। अपराधियों से अपराध से जुड़े सबूत और जानकारी निकालने के लिए नार्को टेस्ट की मदद ली जाती है। नार्को टेस्ट एक डिसेप्शन डिटेक्शन टेस्ट है और इस टेस्ट में व्यक्ति को हिप्नोटिज्म की स्थिति में ले जाया जाता है और फिर उस व्यक्ति से अपराध के बारे में पूछताछ की जाती है। इस टेस्ट में कुछ ड्रग्स का भी इस्तेमाल किया जाता है जिसके जरिए व्यक्ति के चेतन मन को कमजोर करके उसे सम्मोहित करने की कोशिश होती है। इस टेस्ट में अपराधी या आरोपी को सबसे पहले नसों में इंजेक्शन से एनेस्थीसिया ड्रग दिया जाता है और इसके बाद उससे पूछताछ की जाती है।
किन लोगों की देखरेख में होता है नार्को टेस्ट?
नार्को टेस्ट करने के लिए विशेषज्ञों की टीम तैनात की जाती है। इस टीम की देखरेख में ही सुरक्षा एजेंसियां जांच करती हैं। नार्को टेस्ट करने वाली टीम में साइकोलॉजिस्ट, एनेस्थिसियोलॉजिस्ट, टेक्नीशियन और मेडिकल स्टाफ शामिल होते हैं। आरोपी का नार्को टेस्ट करने से पहले फिटनेस टेस्ट किया जाता है और इस टेस्ट में पास होने के बाद ही आरोपी को नार्को टेस्ट के लिए ले जाया जाता है। टेस्ट के दौरान व्यक्ति की स्थिति को देखने के लिए तमाम तरह के मॉनिटर आदि का इस्तेमाल किया जाता है।
नार्को टेस्ट की हिस्ट्री को देखें तो यह जरूरी नहीं है कि हर टेस्ट में पुलिस या जांच एजेंसी को सफलता ही मिली हो। टेस्ट में व्यक्ति से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस या एजेंसी इन्वेस्टीगेशन करती है और इसके आधार पर ही सबूतों को जुटाया जाता है। नार्को टेस्ट के सक्सेस रेट को लेकर भी राय जुदा होती है।
[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से साभार]

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