उत्तराखंड के लिए स्वास्थ्य मंत्री बहुत जरूरी

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– डाक्टर से फीस के 30 लाख वसूलोगे तो कौन चढ़ेगा पहाड़?
– सेटेलाइट क्लीनिक और मोबाइल क्लीनिक की जरूरत

कोरोना की दूसरी लहर आने के बाद टीकाकरण उत्सव का ढोल बंद हो गया। पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब 23 मार्च को लॉकडाउन की घोषणा की थी तो सारी जिम्मेदारी अपने ली थी। इतिहास गवाह है कि कोरोना की जंग एक देश के प्रधानमंत्री से होते हुए गांव के ग्राम प्रधान के हाथों में पहुंच गई। तब भी केंद्र ने राज्यों से पीछा छुड़ा लिया था और आज जब भारत में कोई व्यक्ति एक दिन भी जिंदा रहने की गारंटी नहीं दे सकता है, तब भी केंद्र ने राज्यों को अपने हाल पर छोड़ दिया है। कोविड वैक्सीनेशन का खर्च राज्यों को ही उठाना होगा। ऐसे समय में सीएम तीरथ सिंह रावत ने 50 लाख लोगों के टीकाकरण का बीड़ा उठा लिया है और इस पर 400 करोड़ का ख्रर्च आने का अनुमान है। 20 लाख वैक्सीन के ग्लोबल टेंडर आजकल में खुलेंगे। सवाल यह है कि इस वैक्सीन की आपूर्ति क्या दो माह में पूरी हो सकेगी? इन दो महीनों में पर्वतीय जिलों का क्या हाल होगा? वहां गांव-गांव में कोरोना फैल चुका है और न साधन हैं और न संसाधन। ऐसे में यदि स्वास्थ्य मंत्री होता तो सीएम का कार्य बंट जाता। उन्हें केवल मानीटरिंग ही करनी पड़ती, लेकिन अब सारा भारा सीएम पर है और अन्य मंत्री जिम्मेदारी से बाहर।

प्रदेश सरकार ने सीएचसी-पीएचसी में रैपिड एंटीजन टेस्ट की घोषणा की है लेकिन टेस्ट के लिए पर्याप्त स्किल्ड लोग होंगे? यह बड़ा सवाल है। स्टाफ की पहले से ही कमी है। हमने कभी स्वास्थ्य को महत्व ही नहीं दिया। पिछले 20 साल में 9 पर्वतीय जिलों में एक भी बड़ा अस्पताल तैयार नहीं किया जा सका। अल्मोड़ा मेडिकल कालेज हाल में अस्तित्व में आया है, लेकिन वहां भी हालात सही नहीं हैं। श्रीनगर मेडिकल कालेज पर टिहरी, पौड़ी, रुद्रप्रयाग और चमोली जिले की कोरेाना टेस्टिंग का भार है। एक साल बाद भी वहां दूसरी लैब नहीं बनाई जा सकी।

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कुल मिलाकर उत्तराखंड स्वास्थ्य के मसले में पिछड़ा है। हमने भाजपा सरकार को प्रचंड बहुमत दिया इसके बावजूद एक सीएम पांच साल नहीं चला। एक सीएम के पास 40 विभाग जिनमें स्वास्थ्य, वित्त और लोकनिर्माण थे तो दूसरे के पास भी 20 विभाग हैं। कोरोना महामारी के बावजूद किसी को स्वास्थ्य मंत्री का दायित्व नहीं दिया गया। वर्ष 2021-22 के बजट में चिकित्सा व परिवार कल्याण के लिए 3319.63 करोड़ रुपये, हरिद्वार, पिथौरागढ़ एवं रुद्रपुर में मेडिकल कॉलेज के लिए 228.99 करोड़ और जिला अस्पतालों के विकास के लिए 200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है, लेकिन ये नाकाफी है। हमें ग्रामीण स्तर पर भी हेल्थ वालिंयटंर तैयार करने होंगे। स्वास्थ्य के लिए अल्पकालीन और दीर्घकालीन नीति बनानी होगी।

सब जानते हैं कि पहाड़ के लोग संवेदनशील और अच्छे नर्सिंग होते हैं। आज 2600 पदों पर नर्स की भर्ती होनी है। लेकिन हमें दूसरे राज्यों से नर्स लेनी होंगी। यदि हम चाहते तो हर जिले में कम से कम एक नर्सिंग कालेज तो बना ही सकते थे। पैरा-मेडिकल कालेज भी बनने चाहिए। उत्तराखंड में डाक्टर पहाड़ नहीं चढ़ते, क्यों? जब एक डाक्टर एक करोड़ रुपये की फीस चुकाएगा तो वो पहाड़ क्यों चढ़ेगा? प्रदेश के सरकारी मेडिकल कालेजों में भी 4 लाख 26 हजार रुपये प्रति साल की फीस है यानी 30 लाख रुपये में एमबीबीएस होता है तो वो डाक्टर पहले अपनी पढ़ाई का खर्च वसूलेगा कि जनता की सेवा करने पहाड़ों पर जाएगा। आखिर हम इतनी अधिक फीस क्यों वसूलते हैं? जबकि हमारे मेडिकल कालेजों की रैंकिंग नगण्य ही है। उत्तराखंड के मेडिकल कालेजों की फीस पटना मेडिकल कालेज, एसएन मेडिकल कालेज आगरा, किंग्स जार्ज मेडिकल कालेज लखनऊ से भी कहीं अधिक है। आयुर्वेदिक कालेजों की भी फीस बहुत अधिक है। यदि मेडिकल और पैरा मेडिकल के संसाधन बढ़ाने हैं तो हमें मेडिकल शिक्षा सस्ती करनी होगी।

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गांवों में सेटेलाइट क्लीनिक और मोबाइल क्लीनिक के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाएं दी जा सकती हैं। डाक्टरों को फौज की तर्ज पर रोटेशन के तहत पहाड़ों में तैनाती दी जानी चाहिए। पौड़ी के डिप्टी सीएमओ तोमर के आरोपों की जांच होनी चाहिए कि पिछले आठ साल से वो पौड़ी में ही हैं। उनका कहना है कि वो तबादले के लिए पांच लाख नहीं दे सकते। यानी कि डाक्टरों के तबादलों में भी भ्रष्टाचार होता है।

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से साभार]

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