आज जोशीमठ की बारी, कल सुक्खी टॉप या हर्षिल

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  • विष्णुगाड-तपोवन और एनटीपीसी की सुरंग पर बंद हो कार्य
  • जोशीमठ में तुरंत प्रभाव से ड्रेनेज सिस्टम किया जाए दुरस्त

44 साल बीत गये। आयुक्त महेशचंद्र मिश्रा की रिपोर्ट अप्रैल, 1976 में आई। इसमें कहा गया कि जोशीमठ में ड्रेनेज सिस्टम ठीक हों। यहां बड़े बोल्डर न तोड़े जाएं। विस्फोट न किया जाएं। बड़े निर्माण कार्य न हों। वैज्ञानिकों के अनुसार उस समय जोशीमठ की आबादी लगभग एक हजार के करीब थी। मिश्रा की रिपोर्ट आई और गई। जोशीमठ को प्रशासन और सरकार दोनों भूल गये। चूंकि यात्रा का मुख्य पड़ाव था। ऐतिहासिक जगह थी। नृसिंग मंदिर और शंकराचार्य की गद्दी थी। सामरिक महत्व भी था। गढ़वाल स्काउट और आईटीबीपी दोनों के गढ़ थे। धार्मिक यात्रा सुगम हो रही थी और लोगों की आय भी बढ़नी थी। लोग यहां आते गये और बसते गये।
पिछले 44 साल में यहां की आबादी 20 हजार से भी अधिक हो गयी। इस दौरान न तो ड्रेनेज सिस्टम ही सुधरा और न ही सरकारों ने विकास कार्यों को रोका। विष्णुगाड-तपोवन परियोजना भी शुरू हो गयी। विस्फोट किये गये और भारी निर्माण होने लगा। इस बीच एनटीपीसी सुरंग भी बनाने लगी।
वैज्ञानिकों के अनुसार हेलंग से 900 मीटर की परिधि में मेन थ्रस्ट जोन है। जोशीमठ मोरेन पर बसा है। यहां की निचली चट्टाने और ऊपरी चट्टाने बिल्कुल अलग हैं। यानी मलबे पर बसा जोशीमठ और वहां विकास की अत्याधिक गतिविधियां जोखिम भरी थी। लूज मलबे में 6 मंजिले भवन बना दिये। भवन निर्माण के मानकों को नये सिरे से तय करने होंगे। स्टैडर्ड मानक नहीं चल सकते।
जोशीमठ को लेकर जुलाई 2022 में दो भू-वैज्ञानिकों डा. एसपी सती और डा. नवीन जुयाल ने भी वहां का अध्ययन किया। इसकी रिपोर्ट तैयार की गयी लेकिन सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगी। किसी ने इन दोनों वैज्ञानिकों की बात ही नहीं सुनी। यदि छह महीने पहले इस रिपोर्ट पर मंथन किया जाता तो जोशीमठ को मौजूदा खतरे से बचाया जा सकता था। वैज्ञानिक मानते हैं कि सुक्खी टॉप और हर्षिल भी खतरे में हैं।
सरकार को तुरंत प्रभाव से जोशीमठ और हेलंग के आसपास की गतिविधियां रोकनी होंगी। विष्णुगाड- तपोवन परियोजना और चारधाम यात्रा मार्ग पर बनाई जा रही सुरंग का कार्य भी रोकना होगा। प्रभावितों को तुरंत विस्थापित किया जाना चाहिए। यह हास्यापद है कि आपदा सचिव को ही वहां भेजा जा रहा है और सीएम और मंत्री दूर से तमाशा देखेंगे। सीएम धामी को मौके पर जाना चाहिए ताकि प्रशासनिक अमला त्वरित कार्रवाई करे। नहीं तो जोशीमठ का अस्तित्व खत्म हो जाएगा।
[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से साभार]

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