कौन है ये अमित कपूर और जयकृत कंडवाल?

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  • एक का पिता आठ बार का विधायक और दूसरे का पिता पूर्व सैनिक और आंदोलनकारी
  • देखिए फर्क? समझिए और तय कीजिए कि यह राज्य किसके लिए बना?

इस पोस्ट में दो फोटो हैं। एक फोटो में विधायक हरबंस कपूर का बेटा है अमित कपूर। पूरे कैंट एरिया में इसके बैनर, पोस्टर और दीवारें अटी पड़ी हैं। आठ बार के विधायक पिता हरबंस कपूर अब संभवतः चुनाव नहीं लड़ेंगे। विरासत में राजनीति अपने बेटे को देना चाहते हैं। हाल में दिल्ली भी दौड़ लगाई। क्या लोकतंत्र में भी राजशाही है कि बाप की राजनीतिक विरासत बेटा संभालें? बेशक संभाले, यदि लायक हो तो?
अमित कपूर के पिता के पास अरबों की संपत्ति हैं। इसके बावजूद अमित कपूर पर गरीब बच्चों के छात्रवृत्ति घोटाले में लिप्त होने का आरोप है। हाईकोर्ट से भी जब अमित को राहत नहीं मिली तो उसने जिला समाज कल्याण विभाग के एकाउंट में डकारा गया पैसा जमा कराया ताकि गिरफ्तारी से बच सके। आखिर कितना पैसा चाहिए अमित या इन धन्ना सेठ बने नेताओं और उनके बच्चों को? आखिर इनका पेट कुंआ क्यों बन जाता है? यदि अमित राजनीति में आता है और उसे भाजपा टिकट दे देती है तो इसके क्या मायने होंगे? क्या सही मायने में अमित जनसेवक साबित होगा?
दूसरी ओर यह जयकृत कंडवाल है। देहरादून के घंटाघर के निकट ठीक दीनदयाल उपाध्याय पार्क के निकट वह चाय की रेहड़ी लगाता है। उसकी दो बेटियां हैं। पिछले दो साल से रोजगार न होने पर चाय की रेहड़ी लगाता है। मेरे लिखने के बाद संभवतः पुलिस या सड़क की पटरी से सत्ता की चौखट पर पहुंचे मेयर गामा उसकी रेहड़ी भी उठवा सकते हैं। जयकृत के पिता अवतार कंडवाल पूर्व सैनिक हैं और राज्य आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भागीदारी की। मां महेश्वरी भी चिन्हित राज्य आंदोलनकारी है। जयकृत आंदोलन के समय नवयुवक था और साया संगठन से जुड़ा था। यानी वो भी राज्य आंदोलनकारी है।
राज्य बना और जयकृत जैसे हजारों युवा जिस उम्मीद और सपनों के साथ आंदोलन में कूदे थे, वो धीरे-धीरे धुंधले होने लगे। प्रदेश में आज 14 लाख से भी अधिक बेरोजगार हैं। सरकारे आती रही और जाती रहीं, नेता दिन दूनी रात चौगुने दौलतमंद होते रहे और प्रदेश कंगाल। आज उत्तराखंड पर 66 हजार करोड़ का कर्ज है लेकिन एक भी नेता ऐसा नहीं है जो घाटे में हो। कारण, राज्य तो मिल गया लेकिन जनता की सोच नहीं बदली। वो उन्हीं नेताओं का अपना भाग्य-विधाता बनाती रही जो राज्य गठन से पहले थे। जिन नेताओं ने कोई त्याग, बलिदान नहीं किया वो क्यों राज्य की जनता के सपनों की क्यों परवाह करेंगे?
राज्य गठन को 21 साल बीत गये, लेकिन हालात नहीं बदले। जनता नहीं चेती तो घर-घर में जयकृत कंडवाल जैसे बेबस युवा होंगे और इस बेबसी पर विरासत में राजनीतिक सत्ता मिलने वाले अमित कपूर जैसे नेताओं के बच्चों के अट्ठहास करेंगे। संभलो, जागो। जंग अभी जारी है।
राज्य स्थापना दिवस की शुभकामनाएं.
[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से साभार]

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