शाबास दून पुलिस, एक घोड़े के लिए नेता से क्यों पंगा लें?

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देहरादून की पुलिस बहुत ही समझदार है और नेताजी उससे अधिक समझदार
वजीर जब सर्व शक्तिमान हो तो ढाई चाल वाले शक्तिमान की बिसात क्या?
एक टंटा खत्म हो गया। बेकार में ही कांग्रेसियों ने देश रक्षा में अग्रिम पंक्ति पर कई मोरचों पर तैनात रहे पूर्व फौजी और आधुनिक मंत्री गणेश जोशी और उनके साथियों को फंसा दिया कि एक घोड़े को मार दिया। घोड़ा पुलिस का था, नाम था शक्तिमान। शक्तिमान नाम होने के बावजूद घोड़े से पांच लट्ठ नहीं झेले गये। बेचारे की टांग टूट गयी। टांग टूट गयी तो जिंदगी का सहारा छूट गया। ये घोड़े की टांग थी, नेताओं की नाल नहीं, कि एक दल से दिल टूटा तो दूसरे का दामन थाम लिया। खूब शोर-शराबा हुआ तो अमरीका से नकली टांग भी मंगा दी गयी। लेकिन घोड़ा तो घोड़ा होता है भले ही नाम कुछ भी हो। कुछ ईमान के लिए मर जाते हैं तो कुछ ईमान बेच देते हैं। शक्तिमान ने स्वाभिमान से जान दे दी।
खैर, ये मुई राजनीति होती ही ऐसी है। सत्ता बदली तो देहरादून पुलिस बहुत समझदार है। पुलिस का घोड़ा था, लेकिन सत्ता और व्यवस्था से कौन पंगा लें? व्यवस्था में जब इंसान की कोई औकात नहीं तो घोड़े को कौन पूछे? पुलिस की जांच में गुनाहगार का कोई पता नहीं चला। ठीक भी है। इससे भी अच्छी बात यह है कि आरोपी वजीर गणेश जोशी बहुत ही समझदार निकले। वो जानते थे कि आजकल श्राद्ध चल रहे हैं इसलिए अदालत से बरी होते ही सीधे पहुंच गये बार एसोसिएशन। वकीलों को मिठाई खिलाई। आखिर वकील ही तो हैं न्याय के रखवाले। शक्तिमान मामले में न्याय की जीत हुई और न्याय की देवी काली पट्टी बांधे मुस्कराती रही। शक्तिमान कथा का अंत हो गया। देहरादून पुलिस और मंत्री गणेश जोशी को बधाई।
[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से साभार]

हाय, हाय। दल-बदलू विधायक राजकुमार सीएम बनते-बनते रह गए

 

 

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