बाल साहित्य के विकास की आवश्यकता पर दिया बल

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नई दिल्ली, 15 नवंबर। बाल दिवस के अवसर पर “बाल साहित्य का बदलता स्वरूप- संस्मरण, चर्चा एवं काव्य पाठ” विषय को लेकर उत्थान फाउंडेशन के तत्वाधान में कल जूम मीट पर अंतरराष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। इसमें उपस्थित वक्ताओं ने एक स्वर में माना कि बाल साहित्य के माध्यम से ही बच्चों का सही मार्गदर्शन किया जा सकता है।

कार्यक्रम संचालिका और आयोजिका अरूणा घवाना ने अपने वक्तव्य में कहा कि बच्चे का पहला साहित्य तो लोरी है। भारत में आज मोबाइल साहित्य के हवाले कर मातापिता अपना दायित्व खत्म समझते हैं। अब बच्चे प्यारी सी गुडि़या नहीं रोबोटिक खिलौनों से खेलते हैं। वे उपभोक्तावादी संस्कृति का आसान व सॉफ्ट टारगेट बन गए हैं।

इस वेबिनार के मुख्य अतिथि नीदरलैंड से प्रो मोहनकांत गौतम ने कहा कि माता-पिता द्वारा अपने विचार थोपने से बच्चे का विकास रुक जाता है। बाल साहित्य संस्कार डालने में सहायक रहता है। संस्कार डालने की जिम्मेदारी माता-पिता की भी है। किलो के हिसाब से बिकती किताबों को उन्होंने त्रासदी बताया। उन्हें जोर देकर कहा कि बाल साहित्य को नकारा जा रहा है, जो बहुत ही दुख की बात है। सर्वागींण विकास के लिए बच्चों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखना भी जरूरी है।

अतिथि वक्ता लंदन से ऑनलाइन हिन्दी पत्रिका लेखनी की सर्वेसर्वा शैल अग्रवाल ने कहा बाल साहित्य की जरूरत थी, है और रहेगी। मानव जीवन के लिए यही सुनहरे और स्वस्थ भविष्य की नींव है। उन्होंने कवि सूरदास को पहला बाल साहित्य कवि माना है। काव्य के माध्यम से भी उन्होंने अपने भाव प्रकट किए।

स्वीडन इंडो स्कैंडिक संस्थान के उपाध्यक्ष सुरेश पांडेय ने माना कि संस्कार की संपत्ति ही बच्चों की जरूरत है, जो साहित्य के माध्यम से ही संभव है। साथ ही काव्य पाठ किया।
यूएसए से साइंटिस्ट सीता सोमारा ने बाल साहित्य को बच्चों की विचारक क्षमता को बढाने वाला कहा। उन्होंने माना कि हर किसी का बचपन और उससे जुड़ी यादें सुहानी होती हैं। संस्मरण सुनाते हुए बताया कि बचपन में वे कहानी की किताबें दोस्तों के साथ शेयर करते थे, जो अपनेआप में एक सुखद अहसास था। माध्यम बदल रहे हैं, मीडिया बदल रहा है, तो बाल साहित्य का स्वरूप भी यकीनन ही बदलेगा।
लखनऊ से जुड़ी पूर्णिमा वर्मन ने चंदा मामा को याद करते हुए काव्य पाठ किया। संस्मरण सुनाते हुए बताया कि वे अपनी नातिन को कहानियां सुनाती थीं और यही कड़ी उन्हें कहानीकार और फिर साहित्यकार बना गई। इसी के चलते उन्होंने यूएई से हिन्दी की दो ऑनलाइन पत्रिकाएं शुरू की थीं।
नार्वे से गुरू शर्मा ने बाल साहित्य पर चिंता जताते हुए कहा कि बाल साहित्य की कमी भारत में बहुत खल रही है। उसके चित्रकथा के स्वरूप को भी वे अब मिस करते हैं। भारत में लाइब्रेरी के प्रति बच्चों और माता-पिता की उदासीनता बाल साहित्य के प्रति समाज के रवैया को दर्शाता है।
डेनमार्क से प्रो योगेंद्र मिश्रा कहते हैं कि बच्चों को कुछ भी सिखाने से पहले माता-पिता को स्वयं को बतौर उदाहरण पेश करने की जरूरत है। आज के आधुनिक माध्यमों को पूर्णयता बच्चों के समक्ष प्रस्तुत करने की जरूरत नहीं है। वास्तविकता और जरूरत को बैलेंस करना ही बच्चों के प्रति न्याय है।
अन्य वक्ताओं में मेरठ से चंद्रशेखर शास्त्री ने भाग लिया। उन्होंने कहा कि बाल साहित्य के बिना कोई भी साहित्य पूर्ण नहीं माना जा सकता। आधुनिकता की अंधी दौड़ में संस्कारों और संस्कृति के लोप को लेकर उन्होंने चिंता व्यक्त की। सूरज पर अपनी बाल कविता सुनाकर अपने भाव व्यक्त किए। सबने एक स्वर में स्वीकार किया कि बाल साहित्य बिना कोई भी साहित्य पूर्ण नहीं माना जा सकता। इसलिए बच्चों के साहित्य पर ध्यान देने की बेहद आवश्यकता है।

बाल दिवस पर अंतरराष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन

 

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