निज पथ का अविचल पंथी को चरितार्थ किया है शान्ता जी ने अपने जीवन में

2055

(पुस्तक समीक्षा: एस.एस.डोगरा)

12 सितंबर, 1934 को गांव गढ़जमूला, जिला कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश में जन्में वरिष्ठतम राजनेता साहित्यकार शान्ता कुमार जी ने अपनी आत्मकथा ‘निज पथ का अविचल पंथी’ में पिता के ग्यारह वर्ष की अल्पायु में खोने उपरांत आर्थिक तंगी, बचपन का संघर्ष-युवावस्था-राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रचारक-पारिवारिक जिम्मेदारी-नौकरी-उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए दिल्ली तक का सफ़र एवं राजनैतिक कैरियर को कुल छयालिस 46 अध्यायों में बखूबी बयाँ किया है। चूँकि वे स्वयं राजनेता होने के साथ-साथ बीस से अधिक किताबें भी लिख चुके हैं इसीलिए उनकी लेखन कला ने आत्मकथा को और अधिक रोचक बना दिया है। इस बात की प्रमाणिकता उन्होंने किताब में प्रमुख रूप से अपनी बात में अभिवक्त करते हुए कहा है कि ‘मैंने एक लेखक के रूप में साहित्य जगत की सेवा की है। सबके संबंध में बहुत कुछ लिखा, अब अपने संबंध में स्वयं ही लिखने बैठा हूँ। चुनाव की राजनीति छोड़ने के बाद अब मैं पहले लेखक हूँ उसके बाद राजनेता।

अपनी आत्मकथा के शीर्षक का श्रेय उन्होंने 67 वर्ष पूर्व लिखी कविता को दिया। वास्तव में कश्मीर आन्दोलन सत्याग्रह के दौरान सन 1953 में हिसार जेल में निम्न कविता लिखी जिसके शीर्षक को ही शान्ता जी ने अपनी बड़ी बेटी इंदू के सुझाव पर ही अपनी आत्मकथा का नाम रखा। उस खास कविता पर आप भी गौर फरमाएँ…

मैं निज पथ का अविचल पंथी !
मैं निज पथ का अविचल पंथी !
नहीं रुकूँगा, नहीं झुकूँगा ।
आंधी-झंझा-तूफानों में
मिटते-लुटते अरमानों में
बीहड़ पथ की दुर्गम राहें
घायल दिल की जख्मी आहें
बिजली कड़के…वर्षा बरसे…पग आगे ही सदा धरुंगा …
बैचैन ह्रदय की धड़कन में
मासूम मुखों की तड़पन में
जब मृत्यु तांडव रचती हो
मानवता भी सिर धुनती हो
चुक जाए जब सबका साहस….
मैं तब भी डटा रहूंगा …

सच में उक्त कविता के एक-एक शब्द को अपनी निजी जिन्दगी में साकार करते हुए शान्ता जी ने अपने गाँव में पंच के रूप में कैसे शुरुआत की। उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा और फिर पंचायत समिति के सदस्य, जिला परिषद् कांगड़ा के उपाध्यक्ष एवं अध्यक्ष, विधायक, दो बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री, सांसद फिर भारत सरकार में केन्द्रीय मंत्री तक का शानदार सफ़र तय किया। वैसे शान्ता जी ने अपने 85 पिचयासी वर्ष के लम्बे तथा सफल जीवन के लिए प्रभुकृपा अपने परिवार, मित्रों, जनता-जनार्दन एवं पार्टी के सहयोग, प्यार एवं स्नेह का आभार भी व्यक्त किया है। अपनी आत्मकथा को लिखने में कितना समय लगा विषय पर शान्ता जी ने अंतिम पेज संख्या 423-424 पर स्पष्ट लिखा है कि पिछले जन्मदिन से यह काम शुरू किया था और इस जन्मदिन पर पूरा कर रहा हूँ। पहले अध्याय का पहला वाक्य है- जीवन के 85 वर्ष पुरे कर लिए और इस अंतिम अध्याय का अंतिम वाक्य है जीवन के 86 वर्ष पूरे कर लिए…। मैंने पूरा जीवन जी लिया । जी भर जिया, पूरे आनंद से जिया । जीवन जिया भी और उसकी पूरी कहानी और अनुभव आज विस्तार से लिख भी दिया । जीवन का शेष विवेकानंद सेवा केंद्र में प्रभु को अर्पण करूँगा । अब उस घड़ी की प्रतीक्षा करूँगा, जब मुझे इस बार का दायित्व निभाकर वहां जाना है जहां से मैं आया था । सच कहता हूं हँसता-मुस्कराता गीत गाता हुआ जाऊंगा । शांता जी ने अपनी बात में स्वीकारा भी है कि ‘पाठकों को लग सकता है आत्मकथा की शैली लीक से कुछ हटकर है। फिर भी पाठकों को समर्पित है क्योंकि मेरा जीवन भी तो लीक से हटकर ही बीता है।’

संवाद कला से खुलेगा सफलता का महामार्ग: प्रो. संजय द्विवेदी

कर्म किए जा फल की इच्छा मत कर ऐ इन्सान-जैसे कर्म करेगा वैसे फल देगा भगवान ये है गीता का ज्ञान। गीता के उक्त श्लोक तो काफी लोकप्रिय है ही। लेकिन शान्ता जी की माँ द्वारा बचपन में प्रात: रोजाना गीता पाठ करना तथा मुख्य अध्यापक सुरेन्द्र कपूर जी द्वारा भी गीता के श्लोक की व्याख्या ने आध्यात्मिक पुस्तक गीता ने विशेष जगह बनाई। शान्ता जी गीता को अपने जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा मानते हैं जिसकी वजह से शान्ता जी को जीवन के विपरीत स्थितियों में भी सद्मार्ग चुनने में प्रेरित कर गीता ने उन्हें बल प्रदान करते हुए निरंतर आगे बढ़ने रहने का साहस दिया। वहीँ स्वामी विवेकानंद जी के विचार ‘उठो, जागो, और तब तक नहीं रुको जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाये’ को भी शान्ता जी ने अपने जीवन में अपनाते हुए कभी समाजसेवक, शिक्षक, लेखक, राजनेता, देशभक्त के रूप में बखूबी निभाया जो आज तक कायम है। स्वामी विवेकानंद जी अनुयायी होने का इससे बड़ा क्या प्रमाण हो सकता है कि स्वामी जी व्यक्तित्व से शान्ता जी इतने प्रभावित रहे कि उन्होंने पालमपुर में स्वामी विवेकानंद ट्रस्ट की स्थापना की। जिसके तहत विवेकानंद अस्पताल तथा कायाकल्प (योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा शोध संस्थान) आम जनमानस की सेवा करते स्वास्थ्य लाभ प्रदान करने में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं।

अपनी आत्मकथा में शान्ता जी ने अनेक जगह पर हिमाचली पहाड़ी भाषा के शब्दों घराट (पनचक्की-पानी से चलने वाली अनाज पीसने वाली चक्की) रोट-(मोटी रोटी) का उपयोग किया है जो उनकी अपनी हिमाचली भाषा के प्रति विशेष लगाव का परिचायक है।

दिल्ली में आने के बाद, संतोष जी का जीवन में किस तरह नियुक्ति पत्र माध्यम से मिलना, 1964 में संतोष जी संग अध्यापन करते हुए तथा अंग्रेजी की प्रेरक किताब “How to get what you want’ ‘सफल कैसे हों?’ का अनुवाद करना और दोनों का वैवाहिक बंधन में बंधना। वकालत से विशेष आय नहीं होती थी। विवाह के एकदम बाद की आर्थिक तंगी से कई बार बड़ी मानसिक परेशानी का अनुभव होता था। उदास भी रहता था। परंतु संतोष का प्यार, सहयोग तथा कम आय में भी उसकी पूर्ण संतुष्टि से मेरी उदासी दूर हो जाती थी।

‘ज़िन्दगी की यही रीत है हार के बाद ही जीत है’

शान्ता जी ने अपनी प्रथम पुस्तक “धरती है बलिदान की” लिखी जिसमें वीर सावरकर जी सन्देश सम्मिलित होने के साथ राष्ट्रीय कवि मैथलीशरण गुप्त ने पत्र द्वारा शान्ता जी सराहाना की जिससे लेखन कार्य यानी किताबें लिखने के लिए प्रेरित किया। 1953 में डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नेत्रत्व में “जम्मू-कश्मीर बचाओ” आन्दोलन में भागीदारी तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अन्य दिग्गज नेताओं के सानिध्य में जीवन दर्शन को बहुत करीबी से देखा-समझा। चूँकि शान्ता जी स्वामी विवेकानंद जी के व्यक्तित्व से अत्यंत प्रभावित रहे और स्वामी जी को समर्पित “देशभक्त सन्यासी स्वामी विवेकानंद” लिखी जिसका बाद में अंग्रेजी अनुवाद भी हुआ “A Patriot Monk Swami Vivekanand” पुस्तक पिछले पचास वर्षों में खूब प्रचलित हुई और सराही भी गई। शान्ता जी ने जिला कांगड़ा में प्रदीप नामक साप्ताहिक समाचार पत्र की व्यवस्था एवं संपादन के बाद प्रिंटिंग प्रेस व्यवसाय भी किया जिसका उल्लेख उन्होंने अपनी आत्मकथा के दसवें अध्याय के पेज संख्या 89 पर किया है। यह उनका लेखन-प्रकाशन के प्रति विशेष लगाव को दर्शाता है।

1972 में विधानसभा में विधायक के तौर पर चुना जाना तात्कालिक मुख्यमंत्री श्री यशवंत सिंह परमार द्वारा विधानसभा में पहले भाषण की सराहना को भी व्यक्त किया है। अपने ग्यारवें अध्याय में “दीवार के उस पार” में शान्ता जी ने लिखा है कि मुझे जीवन में दो बार जेल जाने का सौभाग्य मिला जहाँ वेदांत का गहन चिंतन के अलावा चार पुस्तकें जेल में ही लिखने का मौका मिला। और जेल में ही महिला मित्र लक्ष्मी के स्नेहपूर्ण पत्र तथा राखी मिलने का भी उल्लेख किया जिसने शान्ता जी का मनोबल बढ़ाया। अपने जेल काल में शान्ता जी ने रेडियो की महत्वता पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि उस समय हम सबको बाहर की दुनिया से जोड़ने वाला एकमात्र साधन बी. बी. सी. रेडियो था। उसे रेडियो से भारत के सच्चे और निष्पक्ष समाचार मिल जाते थे। ज्यों ही आठ बजते सब बंदी एक जगह इकट्ठे हो जाते, रेडियो को बड़े ध्यान से सुनते और समाचारों के बाद उसकी समीक्षा करते | ‘वॉयस ऑफ अमेरिका’ से भी हमें कभी-कभी कोई समाचार मिल जाता था। मास्को तथा पीकिंग रेडियो यद्धपि अपने ढंग से विरोधी समाचार देते थे, तो भी उनसे कई बार कुछ ऐसा समाचार मिल जाता था जो भारत के रेडियो और समाचार-पत्र नहीं देते थे।

भारतीय राजनीति पर अपने विचार व्यक्त करते हुए शान्ता जी के अनुसार 1977 के चुनाव में जयप्रकाश का व्यक्तित्व सबसे अधिक प्रेरणास्रोत था। भारत के जनमानस को पहली बार नेहरु परिवार के मुकाबले का एक व्यक्ति मिला। उन्ही के प्रयत्नों से पञ्च प्रमुख विरोधी दल एक नई पार्टी में विलीन हुए। एक राष्ट्रीय विकल्प की चिरेच्छा साकार होने लगी। इमरजेंसी से पीड़ित देश जयप्रकाश की इस नई पार्टी की ओर उमड़ पड़ा। जनता स्वयं पार्टी बन गई। जन-धन पार्टी-कोष बन गया। उस प्रबल जन-लहर के सामने जो भी आया, साफ हो गया। कांग्रेस ही नहीं हारी अपितु स्वयं इंदिरा गांधी व उनके पुत्र संजय गांधी भी हार गए।

अपने राजनैतिक कैरियर पर प्रकाश डालते हुए पच्चीसवां अध्याय “अढ़ाई साल बेमिसाल” सच में शांता जी के मुख्यमंत्री कार्यकाल दौरान हिमाचल प्रदेश के इतिहास में उल्लेखनीय कार्यों को उजागर करता है। जिन प्रशंसनीय कार्यों की बदौलत ही हिमाचल प्रदेश राज्य ने खूब तरक्की की। अपने राज्य में गाँव-गाँव पेयजल पहुँचाने उपरांत तात्कालिक प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने शान्ता जी की गुहार पर ही भाखड़ा परियोजना से पंद्रह मेगावाट बिजली अस्थायी रूप से हिमाचल को मिलना तय हो गया। प्रदेश में यात्री बीमा योजना लागू की जिसके तहत दुर्घटना की स्थिति में घायलों और मृतकों के आश्रितों को पांच से पन्द्रह हजार रूपये मुआवजा मिलने लगा। इसमें सरकार की ओर से कोई धन खर्च नहीं किया जाता था प्रत्येक टिकट पर एक-दो पैसे अतिरिक्त देकर यात्री बीमा योजना चलाई गई जो पुरे देश में सराही गई और बाद में अनेक प्रदेशों ने यह योजना शुरू की। श्रम का महत्व बढ़ाने के लिए सभी दिहाड़ीदार मजदूरों की दैनिक मजदूरी सवा चार से बढाकर छह रुपए कर दी गई। भूतपूर्व सैनिक वित् निगम स्थापना की गई ताकि अवकाश प्राप्त सैनिकों को अपने काम-धंधें शुरू करने के लिए ऋण की व्यवस्था हो सके। सुजानपुर में सैनिक स्कूल स्थापना की गई जिसका उद्घाटन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी जी द्वारा किया गया। वहीँ राज्य में अनुसूचित जाति वित् निगम भी स्थापित किया गया जिसके तहत अनुसूचित जाति के लोगों को अपना काम स्थापित करना के लिए धन व्यवस्था करना था। पालमपुर में कृषि विश्वविद्यालय स्थापना, बैजनाथ में आयुर्वेदिक महाविद्यालय स्थापित करना, बिलासपुर तथा कांगड़ा में सीमेंट फैक्टरी स्थापना का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है।

स्वयं लेखन से जुड़े होने कारण शान्ता जी मीडिया की ताकत की बखूबी समझ रखते हैं इसीलिए उन्होंने अपने कार्यकाल में देश के प्रमुख साहित्यकारों एवं पत्रकारों को हिमाचल में निमंत्रित किया ताकि वे सब हिमाचल को स्वयं आकर देखें और प्रदेश की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं, विकासशील कार्यों एवं सौन्दर्यता को अपने-अपने समाचार पत्र में प्रदेश की उपलब्धियों को प्रकाशित कर सकें। गौरतलब है कि इस नीति के तहत धर्मयुग के संपादक श्री धर्मवीर भारती, कादम्बिनी के राजेन्द्र अवस्थी जी, इंडियन एक्सप्रेस के कुलदीप नैय्यर जी, ट्रिब्यून के प्रेम भाटिया जी, पंजाब केसरी के रमेश जी, प्रताप के वीरेंद्र और साहित्यकारों में काका हाथरसी, भवानीप्रसाद मिश्र तथा अज्ञेय जी प्रमुख रूप से हिमाचल में निमंत्रित किए गए। परिणामस्वरूप हिमाचल को मीडिया में खूब प्रचार भी मिला और राज्य को राष्ट्रीय स्तर पहचान मिली।

अपने मुख्यमंत्री काल में हिमाचल में हैण्डपम्म “वन लगाओ-रोजी कमाओ”, “गाँव भी अपना-काम भी अपना”, “काम नहीं-तो दाम नहीं” जैसे चुनौतीपूर्ण निर्णय लागू करना केवल शान्ता जी जैसा कर्मठ व्यक्ति ही कर सकता था जिसका बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी समर्थन किया। पालमपुर में अस्पताल निर्माण में मानव शांति दूत नोबल पुरुस्कार विजेता दलाई लामा जी अपनी पुस्तकों की रॉयलटी का अस्सी लाख रुपए सहायता के अलावा अपने कुछ विदेशी शिष्यों द्वारा पांच करोड़ रूपये की सहायता तथा शांता जी के जन्मदिन 12 सितम्बर को सन 2001-02 में विशेष सोलह लाख इकट्ठा धन खास अहमियत रखता है। क्योंकि इसमें स्कूली बच्चों –गरीब महिलाओं ने भी आर्थिक योगदान किया।

अपनी आत्मकथा में शान्ता जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं पर नाराजगी जताई। वहीँ आज की बदल रही भाजपा पर तंज कसते हुए कहा कि मूल्य आधारित राजनीति के आदर्श के कारण जिस पार्टी को जनता ने विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बनाया, आज वह पूरी तरह से नैतिक मूल्य नहीं केवल और केवल सत्ता आधारित पार्टी बन गई है |

नेपाली राजनीति अधर में

सन 2010 में न्यूयौर्क के राष्ट्र्महासंघ में शामिल होना तथा शान्ता जी द्वारा भाषण में गरीबी का जिक्र करते हुए सब देश ‘अन्त्योदय कार्यक्रम’ प्रारम्भ करें तो पूरे विश्व की गरीबी दूर हो सकती है। राष्ट्रसंघ में भागीदारी अपनी जीवन-यात्रा का सौभाग्यशाली क्षण मानते हैं शांता जी। हालांकि उन्होंने अपनी पुस्तक में अनेक विदेशी यात्राओं अमेरिका, कनाडा, सिंगापूर, दुबई, थाईलैंड का भी खास जिक्र किया है।

“मैं जीवन के अंतिम मोड़ पर खड़ा हूँ। मुझे प्रभु ने, जनता ने और पार्टी ने सब कुछ दिया। अब मेरे जीवन की एक ही इच्छा है कि मेरी पार्टी भारतीय जनता पार्टी राजनीति के प्रदूषण से बचे। अवमूल्यन न हो और केवल और केवल मूल्य आधारित राजनीति के उसी मार्ग पर चले तभी स्वामी विवेकानंद जैसे राष्ट्रीय महापुरुषों और भगतसिंह जैसे शहीदों के सपनों का भारत बन सकेगा |” उपरोक्त चार पंक्तियां शान्ता जी के राष्ट्र-प्रेम तथा विशाल व्यक्तित्व का आईना प्रतीत होती हैं। एक ऐसा व्यक्ति जिसने हमेशा ही मानवता, देश-प्रेम, कर्तव्यनिष्ठता, ईमानदारीपूर्वक सहज एवं सादगी भरा जीवन जीते हुए अपने संपर्क में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से करोड़ों देशवासियों के दिल में विशेष जगह बनाई है। भले ही शान्ता जी लम्बे समय तक सक्रिय राजनीति में रहे लेकिन लेखन के प्रति विशेष रूचि ने उन्हें विचारक या दार्शनिक बना डाला। और समाजसेवक के रूप में इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि वे पालमपुर स्थित योग एवं प्राकृतिक शोध संस्थान “कायाकल्प” में जन-कल्याण कार्य में आज भी कार्यरत हैं। भारत सरकार से अब यही अपेक्षा की जाती है कि शान्ता जी के उल्लेखनीय योगदान के लिए, भारत रत्न जैसे राष्ट्रीय सम्मान से उन्हें सम्मानित किया जाए।

(समीक्षक: एस.एस. डोगरा-एफआईएमटी कॉलेज, आई.पी.यूनिवर्सिटी, दिल्ली के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में बतौर असिस्टेंट प्रोफ़ेसर पद पर कार्यरत हैं।)

किताब का शीर्षक: निज पथ का अविचल पंथी @ लेखक: शान्ता कुमार
(पुस्तक में मूल लेखन 424 पृष्ठ तथा रंगीन 40 पृष्ठ कुल 464 पृष्ठ)
सजिल्द मूल्य 950/- नौ सौ पचास रुपये, पेपरबैक कीमत: 550/- पांच सौ पचास रुपये

प्रकाशक: किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नयी दिल्ली-110002
आईएसबीएन-978-81-951663-5-0 प्रथम संस्करण: 2021
[5/23, 15:32] Mr Dogra: प्रेस विज्ञप्ति 23/5/2021

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