संपूर्ण हिमालय को निगलना चाहते हैं उत्तराखंड के नेता

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  • और ग्लेशियर का सारा पानी पीना चाहते हैं!
  • आओ, संकल्प लें, दल-बदलने वाले नेता को चुनाव में हराएं!

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव की आहट होते ही नेता सड़क, चौराहों और जनता के बीच नजर आने लगे हैं। ये नेता अप्रैल-मई माह में अपने बिलों में चूहे की तरह छिपे हुए थे। कोरोना काल में जब किसी को आक्सीजन चाहिए था, अस्पताल में बेड चाहिए था, खून चाहिए था और रेमडेशिविर के इंजेक्शन चाहिए थे। एंबुलेंस चाहिए थी, अधिकांश नेता अपनी कोठियों की बेसमेंट में छिपे थे। तब इन्हें मौत का भय सता रहा था। चुनावी सीजन आते ही नेता बिलों से बाहर आ गये। नेताओं के मक्कार चेहरों पर लोमड़ी सी चालाकी नजर आने लगी है और उन्होंने गीदड़ की खाल जैसे अपने बदन पर सफेद कुर्ते टांग दिये हैं। वो हंस रहे हैं, लोगों को गले लगा रहे हैं, वो सरासर झूठ बोल रहे हैं और जनता को सब्जबाग दिखा रहे हैं।
बाजार सजा है और नेता बिक रहे हैं। सबकी अपनी अपनी औकात है। उत्तराखंड के अधिकांश नेताओं का इतिहास उठा लो, दस रुपये की भी औकात नहीं थी। ठेकेदारी, दलाली के सहारे ये नेता हमारे भाग्यविधाता बन गये। रातों रात करोड़पति और अरबपति बन गये। इससे भी इनका पेट नहीं भर रहा है। ये हिमालय खाना चाहते हैं और ग्लेशियरों का सारा पानी पी जाना चाहते हैं। देवभूमि को बेच देना चाहते हैं। दल-बदल करने वाले यही नेता देवभूमि के दानव हैं।
इस बाजार में बिकने वाले नेताओं का जनता तमाशा देख रही है। धड़ों में बंटी हैं जनता। असल जनता रो रही है लेकिन धड़ों में खुश हो रही है, तालियां बजा रही है। कुछ गालियां दे रही है और फिर बुराई कर चुपचाप घरों में सो रही है जनता। आखिर हम चुप क्यों हैं? सुबह दूध, चीनी, चायपत्ती खरीदने से रात की रोटियों के लिए हम जो आटा खरीद रहे हैं। गरीब से गरीब जनता उस पर टैक्स चुका रही है। लेकिन नेता गरीब जनता के इस टैक्स पर कुंडली मार कर बैठा है। मौज कर रहा है। आखिर कब तक चुप रहेगी मुई जनता।
मेरा सुझाव है कि एक प्रेशर ग्रुप बने जो जनता की आवाज को इतनी जोर से उठाएं कि नेताओं के कान के परदे फट जाएं। साथ ही दल बदलने वाले नेताओं को हराने के लिए संकल्प लें। ताकि देवभूमि पर लग रहे आयाराम-गयाराम के कलंक को मिटाया जा सके। मेरा उन सभी लोगों से निवेदन है कि घर बैठ कर उत्तराखंड के सुखी और समृद्ध बनने का सपना साकार नहीं होगा। संकल्प लें और इन गिरगिटों को सबक सिखाएं।
[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से साभार]

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